सड़क दुर्घटना के मृतक पहाड़िया दिलीप देहरी के परिजन सरकारी सहयोग से वंचित

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शिकारीपाड़ा/दुमका I आखिरकार, क्या सड़क दुर्घटना के मृतक को जनता द्वारा सड़क जाम के बाद ही सरकारी मुआवजा / राहत सामग्री दिया सकता है? एक ऐसी ही सवाल उभरते नजर आ रहा है।      शिकारीपाड़ा प्रखंड कार्यालय से महज पाँच सौ मीटर दूरी के दायरे पर अवस्थित काॅलोनी पाड़ा के कमजोर, गरीब, आदिम जनजाति समुदाय के दिवंगत दिलीप देहरी का दर्दनाक मौत शिकारीपाड़ा के मुख्य सड़क पर दिन-दहाड़े सड़क दुर्घटना में विगत 20 फरवरी को हुआ था। जिससे मृतक का लाश पहचानना भी मुश्किल लग रहा था। ऐसी दिल दहलानेवाली घटना के बावजूद  न किसी ने सड़क जाम किया और  न ही आजतक किसी सरकारी पदाधिकारी ने  मृतक के परिजनों का घर जाकर उनकी सुधि ली।  इतना तक कि उनके परिजनों को सांत्वना स्वरूप एक फूटी कौड़ी राशि या राशन भी मुहैया नहीं कराया गया। 

   आज आदिवासी मूलवासी विकास मोर्चा के केन्द्रीय अध्यक्ष हाबिल मुर्मू के नेतृत्व में  एक प्रतिनिधिमंडल ने मृतक पहाड़िया दिलीप देहरी  के शोकाकुल परिवार  जाकर उनके परिजनों की सुधि ली।  

     इस दरम्यान दिवंगत दिलीप देहरी के बुजुर्ग माता समीरा देवी ने रो-रोकर बताई  कि मैं अपना दुखड़ा किसको सुनाऊँ? बेटे की दर्दनाक मौत पर दिल सहम जाता है। मन टूटकर बिखर गया है। मेरे तीन पुत्र में से दिलीप देहरी ज्येष्ठ पुत्र थे। मंझले पुत्र का देहांत पूर्व में ही चिकित्सा के अभाव में बीमारी से मृत्यु हो चुकी है। पति भी पहले ही गुजर चुके हैं।  पति शोक और दो पुत्र शोक लगातार हम झेलने के लिए विवश हैं। 

        अंचल कार्यालय पर दो-दो बार आवेदन जमा करने के बावजूद भी प्रखंड प्रशासन के ओर से हमें आजतक कोई तत्कालिक सरकारी सहयोग राशि या कोई राहत सामग्री नहीं मिला।  जिसका हमें बहुत बहुत दुख और अफसोस है। 

      आगे वह अपने दिवंगत बेटे की दास्तान सुनाती हुई कहती है कि अत्यधिक गरीबी के कारण दिलीप बेटा पुराने साठ दशक में प्राप्त टूटा फूटा पहाड़िया आवास पर निवास करता था।  रोजी रोजगार के लिए वह रोज जंगल से लकड़ी काटकर लाता था और उसे स्थानीय हाट बाजार में बेचकर गुजारा चलाता था।  उनका न  राशनकार्ड था और न आधार कार्ड था। जिससे उसे कोई सरकारी लाभ नहीं मिल पाता था।  जिस दिन रोजी रोजगार नहीं कर पाता तो दुख के मारे तथा दो-पाँच रूपये से नशापान कर  लाज शर्म दूर करके राहगीरों से माँग कर गुजारा करने के लिए विवश था। वह बहुत शांतिप्रिय था बगैर नशापान स्थिति में उसका आवाज सुनने के लिए हम तरस जाते थे। दिलीप का शादी भी नहीं हुआ था काड़ाकटा ग्राम से कोई एक लड़की उनके साथ एकाध महीना थी वह भी उसे दो माह पूर्व छोड़कर चली गई थी। जिससे वह और अधिक टूटकर बिखर गया था।         इस संदर्भ पर उनके परिजनों ने समाज सेवी हाबिल मुर्मू और उनके प्रतिनिधिमंडल से सरकारी सहयोग दिलाने का निवेदन किया।         जिस पर समाज सेवी हाबिल मुर्मू और उनके प्रतिनिधिमंडल ने शोक संतप्त परिवार के प्रति दुख जताया और ढाढ़स बंधाते हुए स्थानीय प्रशासन की कड़ी निन्दा की और  कहा कि स्थानीय प्रशासन आदिम जनजाति के खिलाफ कितना असंवेदनशील और लापरवाह 

है इसी घटना से पता चलता है।

संथाल परगना में आदिम जनजाति और आदिवासी समाज अपने ही घर पर सरकारी उपेक्षा के शिकार होना बहुत ही बहुत दुखद दास्तान है। उन्होंने  मृतक दिलीप देहरी के परिजनों को  न्याय दिलाने में सहयोग देने का सांत्वना दिया तथा आवश्यक स्थिति पर जनांदोलन करके भी न्याय दिलाने का ऐलान किया।       इस अवसर पर आदिवासी मूलवासी अल्पसंख्यक मोर्चा के केन्द्रीय अध्यक्ष मंजर अंसारी, सक्रिय कार्यकर्ता सहबील मुर्मू, अर्जुन सिंह,  दिवंगत दिलीप देहरी के छोटा भाई सजल देहरी,  माता समीरा देवी सहित अन्य परिजन उपस्थित थे।

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