बौंसी का मंदार संकरात मेला

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‘मंदार संकरात’ मकर संक्रांति को कहा जाता है इस अङ्ग क्षेत्र में। अब भी आप इसे दीर्घवय के पुरोधाओं से सुन सकते हैं। वे आपको बताएंगे कि मंदार संकरात को किस तरह वे छाप (हुड) लगी बैलगाड़ी की सहायता से घर और समाज के लोगों की टोली के साथ मकर संक्रांति को मंदार आते थे। 
इस टोली में महिला, बच्चे और पुरुष की संख्या बहुत होती थी। वस्त्र-भोजन सामग्री के साथ पुरुषों की संख्यानुसार कुछ हथियार भी होते थे। इनमें भाला, बर्छी, फरसा, तलवार, गुप्ती प्रमुखता से होते थे। 
बैलगाड़ी में कुछ लीटर किरासन तेल, लालटेन और पेट्रोमैक्स भी हुआ करता था। एक-दो मशाल बनाकर भी लोग आते थे। यह सब जुगाड़ था बटमारों और जंगली जानवरों से बचाव के लिए। तब मंदार का क्षेत्र उजाड़ था और जंगली जानवरों तथा पास के कुछ लुटेरों-व्यभिचारी लोगों से त्रस्त था मगर श्रद्धालुओं की संख्या कम न होती थी। एक साथ दर्जनों बैलगाड़ियों का काफिला निकलता था। आगे की बैलगाड़ी का सार्थवाह कोई गीत के तराने छेड़ता और साथ बैठे सभी लोग उसपर दोहारी देते। यह ध्वनि-क्रम साथ के सभी बैलगाड़ियों से आता था। इस समवेत ध्वनि से बटमार और जानवर दूर भाग जाते थे। 
किसी-किसी ऐसे यात्री समूह के आगे हरिकीर्तन दल हुआ करता था। ये चैतन्य महाप्रभु की परंपरा का कीर्तन गाते हुए आगे-आगे चलते थे। बैलों के गले में बंधे घुंघरुओं के नाद ढोल, मांदर, झुनकुट्टी, थाली के साथ बड़ा ही मनोरम हो जाता था। इसमें मानव झुंडों का करताल वैष्णव परंपरा की अमिट छाप छोड़ता जाता। 
अपने समाज से मंदार पहुंचने के क्रम में जहां-जहां से यह काफिला गुजरता उन गांवों के लोग अपने सामर्थ्य के अनुसार लोगों की सेवा करते। तब लोगों के अधिकतम घर मिट्टी-फूस-खपड़ैल के थे। लेकिन लोग अपने घरों में एक खुला स्पेस अवश्य रखते थे जहां आगंतुक विश्राम कर सकें। इसे ‘बंगला’ कहा जाता था। यह भी छत से ढका रहता था। तीन तरफ दीवारों से घिरा रहता था। प्रवेश का खुला इलाका कुछ स्तंभों पर टिका रहता था। इसमें बिछाने के लिए नरुवा (पुआल) की व्यवस्था रहती थी। ठंड से लोगों को बचाने के लिए लकड़ी और पुआल जलाने की व्यवस्था भी ग्रामीण करते थे। कुएं पर बढ़िया सफाई की गई एक दोल (बाल्टी) और रस्सी की व्यवस्था भी की जाती थी। यह सच अस्तित्व का सर्वोत्तम उदाहरण था। यह ‘अतिथि देवो भवः’ की सनातन परंपरा का निर्वहन था। यह वो परंपरा थी जहां ‘धर्म’ धन पर हावी था। धन-स्वार्थ नगण्य था।
मंदार पहुंचने पर यह काफिला बहुत बड़ा हो जाता था। मंदार संक्रांति का यह समय भरपूर ओस (कोहरे) से भरा होता था। लोग विशाल वृक्षों के नीचे अपनी बैलगाड़ियों के नीचे छाप डालकर (कवर करके) अलाव जलाकर शरण लेते थे। 
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आज से 40 वर्षों पहले मंदार पर आरोहन करने से पहले नीचे स्थित पापहरणी सरोवर में लोग स्नान करते थे। तिल-गुड़ से बने व्यंजन भगवान मधुसूदन, सूर्य और वरुण देवता को समर्पित करते थे। फिर इस पवित्र पर्वत पर चढ़ते थे। 
चढ़ाई के क्रम में सबसे पहले 3 फीट के एक स्तंभ पर महिषासुरमर्दिनी की 18 सेंटीमीटर व्यास की एक भग्न मूर्ति थी। यह पीलर लगभग 2 फीट भूमि में गड़ा हुआ था। 
महिषासुरमर्दिनी की इस मूर्ति से आरंभ हो जाता था लोगों का देवभोग समर्पण। काले तिल और गुड़ से बने लड्डू अपनी क्षमता के अनुसार लोग समर्पित करते थे। इन मूर्तियों के समक्ष जो भोग सामग्री चढ़ा हुआ रहता उससे गृहत्यागी सन्यासियों, भिक्षुकों, बंदर व खगों के लिए दैविक वरदान हो जाता था। 
कुछ लोग इन चढ़ावों से एक मुट्ठी प्रसाद के रूप में ले लेते थे ताकि अपने समाज के लोगों को दो-दो दाने मंदार संकरात का प्रसाद दे सकें। 
वे शीर्ष के भगवान मधुसूदन मंदिर (अब जैन मंदिर) तक भोग समर्पण करते जाते। मूर्तियों को प्रणाम करते जाते। कहीं दंडवत भी होते। साधुओं को दान भी देते। इस दान में अन्न और मुद्राएं भी होती थी। 
शीर्ष मंदिर से फिर वापस होते थे। इस क्रम में पर्वत के मध्य सीता कुंड के समीप कुएं के पास ठहरते और अल्पाहार लेते थे। इस कुएं का पानी आज भी उतना ही स्वादिष्ट और निर्मल है। इसके मिनरल्स के समक्ष आरओ का पानी कहीं नहीं ठहरता।
यहां से लोग बौंसी मेला देखने जाते थे। वहीं भगवान मधुसूदन का दर्शन करते थे। दान में अन्न और द्रव्य/मुद्रा देते थे। तदुपरांत भोजन करते थे। 
मेले में आवश्यकता की वस्तुएं क्रय करने के उपरांत वे अपने-अपने ग्रामों की ओर लौटते थे। 
कुछ ऐसा था ‘मंदार संकरात’ मेला, बौंसी का। 
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