विलुप्त होती कठपुतली कला के संरक्षण की है आवश्यकता

विश्व कठपुतली दिवस 21 मार्च पर विशेष

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डुमरी। दम तोड़ती कठपुतली कला को संवारने का काम राजगढ़ स्थित शाहगंज रोड गांव निवासी इमरती मिस्त्री विश्वकर्मा कर रहे हैं।उनकी अगुलियों पर जब कठपुतलिया नाचना शुरू करती है तो लगता है कि उनमें जान आ गई है।अब कम ही लोग मनोरंजन के लिए कठपुतली का खेल देखते हैं।इससे होने वाली आय भी बहुत कम हो गई है लेकिन इमरती है कि अपने जज्बे के बल पर इस कला को बचाए हुए है। उनका कहना है कि आज कठपुतली का नृत्य कोई नहीं देखना चाहता।मोबाइल फोन और इंटरनेट के इस युग में बच्चों के पास इसके लिए समय नहीं है।इमरती कहते हैं कि यदि किसी ने रुचि दिखाई तो नृत्य दिखा देता हूं और उस दिन की रोटी का भी जुगाड़ हो जाता है।इमरती के परिवार की चार पीढ़ियों ने कठपुतली नृत्य दिखाते रहे हैं।वह स्वयं 52 वर्षों से इस कला से जुड़े हैं।वह बताते हैं कठपुतली लकड़ी यानी काष्ठ से बनाई जाती है इसलिए इसका नाम कठपुतली पड़ा, जिसमें लकड़ी,धागे,प्लास्टिक या प्लास्टर आफ पेरिस की गुड़ियों से जीवन के प्रसंगों की अभिव्यक्ति तथा मंचन किया जाता था।वहीं राजगढ़ क्षेत्र के नदिहार गांव में पुरवा की बस्ती में चार पीढ़ियों से कठपुतली का नाच दिखा रहे उपेंद्र विश्वकर्मा ने बताया कि वह इमरती मिस्त्री विश्वकर्मा के रिश्तेदार हैं।बताते हैं कि राजगढ़ क्षेत्र के नदिहार गांव में कठपुतली का काम लगभग सभी लोग धीरे-धीरे छोड़ रहे हैं।इस लोककला से जुड़े यहां दस घर हैं जिनमें से तीन-चार परिवार ही कठपुतली नृत्य दिखा रहे हैं।बताते हैं कि दिन बहुत अच्छा गुजरा तो 200 से 300 रुपये की कमाई हो जाती है हालांकि एक वक्त था जब इस काम में अच्छा पैसा मिलता था।उनके दादा सरजू विश्वकर्मा कठपुतली बनाते और लोगों का मनोरंजन करते थे। इसके बाद पिता मुदिरका विश्वकर्मा ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया।बताया कि विश्व कठपुतली दिवस की शुरुआत 21 मार्च 2003 को फ्रांस में हुई थी, इसके बाद यह दिवस सभी देशों में मनाया जाने लगा।भारत में भी इस दिवस का आयोजन दिल्ली,कोलकाता, मुम्बई, बनारस सहित देश के अनेक भागों में मनाया जाता है लेकिन त्रासदी यह है की भारतवर्ष की यह विधा आज एक लुप्तप्राय विधा के रूप में गिना जाने लगा है।बताया कि कठपुतली कला बदलती तकनीक के साथ तालमेल नहीं बिठाता तो यह विलुप्त हो जाएगा।कठपुतली के परिणामों को लेकर चिंतित हैं। राढ़ बंगाल में कठपुतली की पारंपरिक परंपरा कोई अपवाद नहीं है।शहर ही नहीं इस लहर ने ग्रामीण बंगाल के जनजीवन को भी प्रभावित किया है।भारत के तटीय राज्यों में कठपुतली की लोकप्रियता लगभग कुछ सौ वर्ष पुरानी है।राजस्थान या मणिपुर जैसे राज्यों में कठपुतली की लोकप्रियता अभी भी अपने चरम पर है।सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म का प्रचार करने के लिए और वैष्णववाद के प्रचार के लिए श्री चैतन्यदव ने कठपुतली कला का इस्तेमाल किया था। सुकुमार सेन के एक लेख के अनुसार चैतन्य से पहले बरू चंडीदास द्वारा लिखित ‘श्रीकृष्णकीर्तन’ एक कठपुतली नाटक की पांडुलिपि है।इस परंपरा को जीवित रखने के लिए शुभ जोआरदार का ‘बंगपुतुल संगठन’ चालीस साल पूर्ण कर इकतालीस वें वर्ष में पदार्पण कर चुका है।हालांकि सुरेश दत्त के अनुरोध पर जो काम आरम्भ हुई थी।आज  प्रस्तुतियों की संख्या 50 से अधिक हो गई है।मोहित चट्टोपाध्याय के नाटक, खालिद चौधरी की मंच परिकल्पना, तापस सेन का प्रकाश संयोजन और पर्व बंगाल (बांग्लादेश) के मुस्तफा मोनवर द्वारा कठपुतलियों के निर्माण ने इस पारंपरिक कला को समृद्ध तो किया। पर जन चेतना के अभाव में एकत्रित कर न सके।कठपुतली का खेल बच्चों के लिए एक खेल तो है पर इन्हें चलना या संचालित करना कोई बच्चों का खेल नहीं।इसे एक निपुण शिल्पी या कलाकार ही चला सकता है।

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