कठपुतली कला छादर बादरनी के संरक्षण को लेकर वर्कशॉप आयोजित

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जामा I जामा प्रखंड अंतर्गत अलहाद डुमरिया में रसिक गैरवी बेसरा मेमोरियल ट्रस्ट, दुमका के द्वारा 22 से 27 मार्च तक संथालों की विलुप्त होती रही कठपुतली कला छादर बादरनी के संरक्षण के लिए वर्कशॉप आयोजित किया गया। वर्कशॉप का उद्घाटन डॉ धुनी सोरेन, डॉ स्टेपी टेरेसा मुर्मू एवं समप रनवीर सिंह ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्वलित कर किया। वर्कशॉप को संबोधित करते हुए डॉ धुनी सोरेन ने बताया कि विलुप्त प्राय: परंपरागत आदिवासी कठपुतली लोक कला को चदर-बदर या चादर-बदोनी के नाम से जाना जाता है। आदिवासी समुदाय के बीच यह मान्यता है कि मानव एक कठपुतली के समान है जिसकी डोर प्रभु के हाथ में है और इसी भावना को इनके द्वारा गीत-संगीत व कठपुतली के माध्यम प्रदर्शित किया जाता है। उन्होंने कहा कि इसका कला इतिहास भादो माह से ही जुड़ा है। डॉ स्टेफी टेरेसा मुर्मू ने कहा कि डॉ धुनी सोरेन जो इंग्लैंड में रहते हैं उन्होंने युनिनाइट नेशन में आदिवासी का प्रतिनिधित्व भी किया है संथालों पर कई किताबें भी लिखी है वहीं उन्होंने सिल्वीया जो आस्ट्रेलिया के एक समाज सेवक हैं पिछले 30 सालों से संथाल गांवों में का कार्य कर रही हैं। वहीं कार्यक्रम में डॉ संपम रणबीर सिंह क्षेत्रिय शाखा निदेशक इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र रांची, प्रतिभा टुडू अध्यापिका बीएड कोलेज, सुशीला टुडू, संथाल महिला उघमी, छादर बाहरनी कलाकार भानेश्वर मुर्म, कार्यक्रम में सैकड़ों महिलाओं मौजूद थें वहीं ट्रस्ट का कार्यक्रम में आशुतोष, प्रशांत आदि मौजूद थे।

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