जामताड़ा। मारंग बुरु पारसनाथ पहाड़ संताल आदिवासियों का ईश्वर है। संताल आदिवासी अपनी सभी पूजा-अर्चनाओं में सबसे पहले हिरला मारंग बुरू हिरला का उच्चारण करते हैं। पारसनाथ पहाड़ में आदिवासियों का जाहेरथान अर्थात पूजा स्थल भी है। जहां युग-युग से आदिवासी पूजा अर्चना और धार्मिक- सांस्कृतिक सेंदरा या शिकार भी करते आ रहे हैं। यह मारंग बुरू मुसलमानों के मक्का मदीना, हिंदुओं के अयोध्या राम मंदिर, ईसाइयों के रोम वैटिकन सिटी गिरजाघर और सिखों के स्वर्ण मंदिर से कम महत्वपूर्ण नहीं है। अतः सरकारों द्वारा आदिवासियों की धार्मिक मान्यता और भावनाओं पर हमला करते हुए आदिवासियों को पूर्णता दरकिनार कर मारंग बुरू को आदिवासियों से छीनकर जैनियों को सुपुर्द करना मतलब आदिवासियों के भगवान का कत्ल करने जैसा है। आदिवासियों का धार्मिक अन्याय, अत्याचार और शोषण करना है।
उक्त बातें मंगलवार को समाहरणालय के समक्ष धरना कार्यक्रम में आदिवासी सेगेंल अभियान के कार्यकर्ताओं ने कही। कार्यकर्ताओं ने पारसनाथ के पुनर्वापसी की मांग की।कहा कि मारंग बुरु पर आदिवासियों का प्रथम अधिकार है। इसकी पुष्टि इंग्लैंड में अवस्थित प्रिवी काउंसिल ने भी 1911 में जैन बनाम संताल आदिवासी के विवाद पर संताल आदिवासियों के पक्ष में फैसला देकर किया था।कहा कि मारांङ बुरु को अविलंब जैनों की कब्जे से मुक्त किया जाए अन्यथा आदिवासी सैंगल अभियान एक लाख सेंगेल सेना के साथ अपनी ईश्वर- मारांङ बुरु की मुक्ति को मजबूर हो सकता है।इस अवसर पर आदिवासी सेगेंल अभियान के जामताड़ा अध्यक्ष गोपाल सोरेन, जामताड़ा प्रखंड अध्यक्ष संजीत सोरेन, नारायणपुर अध्यक्ष राजेश बेसरा,करमाटांड़ अध्यक्ष बालदेव किस्कू,फतेहपुर अध्यक्ष शिव ठाकुर सोरेन, निरोश्वर मराण्डी बिरेंद्र सोरेन,बिशु मुर्मू, देवलाल मुर्मू, दिबीलाल मुर्मू, हेमंत मरांडी, परमेश्वर बेसरा,सोहान मरांडी,सुखसेन मरांडी आदि मौजूद थे।
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