बाल मजदूरी करवाना अपराध, बचपन छीनने वालों पर हो कार्रवाई : देवेश कुमार देव

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डुमरी I वर्तमान समय में क्षेत्र में संचालित होटलों,ढाबों एवं ईंट भट्ठों में बाल मजदूर आसानी से मिल जायेंगे हालांकि यह अलग बात है कि प्रशासन की पकड़ में आने पर ऐसे होटलों,ढाबों एवं ईंट भट्ठा संचालक बच्चे को अपना ही रिश्तेदार बताकर बचने का प्रयास करते हैं।बाल मजदूरी पर चिंता जाहिर करते हुए क्षेत्र के शिक्षाविद देवेश कुमार देव ने बुधवार को संवाददाता से बातचीत करते हुए कहा कि बच्चे से उसका बचपन छीनना,उनकी प्रतिभा को कुंठित करना,उनके स्वाभिमान को ठेस पहुंचाना और उनके शारीरिक व मानसिक विकास को अवरूद्ध करना बाल मजदूरी के अपराध की श्रेणी में आता है।लाख कोशिशों के बावजूद विश्व में करोड़ों बच्चे बाल मजदूरी के मकड़जाल में उलझे हुए हैं।बाल श्रम कानून 1986 के अनुसार 18 वर्ष या 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों से काम करवाना अपराध है।इस कानून के तहत बाल श्रम करवाने वालों को 6 महीने से 2 वर्ष की सजा या 20000 से 500000 रुपये का जुर्माना या दोनों हो सकता है।कहा कि बाल मजदूरी के रूप होटलों में बरतन धोते,चाय की टपरी में चाय बेचते बच्चे,ट्रेनों व बसों में ठंडा पानी ले लो की आवाज लगाते,लोगों के जूते चमकाते बच्चे,ट्रैफिक में खिलौने बेचते,भीख मांगते,कचरा चुनते,कारखानों में खतरों से खेल कर काम करते बच्चे जैसे अनेक रुपों में बाल मजदूरी के फंदे में फंसे बच्चे समाज के हर क्षेत्र में बच्चे नजर आ जाऐंगे।वहीं मानवता के दुश्मन कई लोग काम देने के बहाने बच्चियों के द्वारा अमानवीय कुकृत्य करवाते हैं। छोटू एक चाय लाना,आज यह प्रचलित वाक्य सभ्य समाज बोलकर इस जघन्य अपराध को बढ़ावा देता है।कानून तो बने हैं परंतु इस मुद्दे को न उठाने वाले लोगों की कमी की वजह से यह समस्या अब तक बनी हुई है।बाल मजदूरी को रोकने के लिए कारगर उपाय करने होंगे।कानून ही इसके लिए काफी नहीं है।बहुत  से सामाजिक व्यक्ति बाल मजदूरी को बंद करवाने में आगे आते हैं परंतु उन्हें पुनर्वास,शिक्षा एवं भोजन की व्यवस्था करने की समस्या रुकावट बनती है।कहीं कहीं पर बच्चों के माता-पिता और उनके अभिभावकों का ही कोपभाजन बनना पड़ता है।बच्चों को बाल मजदूरी न करवाने के लिए माता-पिता और अभिभावकों को जागरूक करना होगा और बच्चों के उचित देखभाल के लिए संगठित होकर कदम उठाने होंगे।ऐसे गरीब माता-पिता के बच्चों की शिक्षा का खर्च समाजसेवियों को उठाना होगा तथा सरकार और प्रशासन को भी सख्त कदम उठाने होंगे।सभी विभागों में गरीब बच्चों के लिए एक छात्र-कोष बनाकर इस कार्य को आसान बनाया जा सकता है।

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