किसानों के प्रति संवेदनशील नहीं है झारखंड सरकार : जयप्रकाश 

ऐसा कोई सगा नहीं, जिसको हेमंत सोरेन ने ठगा नहीं : जयप्रकाश

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बासुकीनाथ। दुमका जिला भाजपा किसान मोर्चा के अध्यक्ष जय प्रकाश मंडल ने झारखंड की हेमंत सरकार को किसान विरोधी बताया है। गोड्डा सांसद निशिकांत दूबे के सांसद प्रतिनिधि और भाजपा किसान मोर्चा के दुमका जिलाध्यक्ष जयप्रकाश मंडल हेमंत सोरेन सरकार और सरकार के कैबिनेट में कृषि,पशुपालन एवं सहकारिता मंत्री बादल पत्रलेख पर हमलावर रूख अपनाते हुए जयप्रकाश ने गुरुवार को एक के बाद कई आरोपों की झड़ी लगा दी। जयप्रकाश ने कहा कि कहने को तो हेमंत सरकार खुद को किसानों एवं मजदूरों का हितैषी कहती है। लेकिन ऐसा होता दिखाई नहीं पड़ता। इनके हर चुनावी वादे खोखले साबित हुए हैं। मुख्यमंत्री से लेकर कृषि मंत्री तक अपने आपको किसान का बेटा और हमदर्द कहते हैं, पर इनकी कथनी और करनी में बड़ा अंतर है। इन्होंने चुनावी घोषणा में कहा था कि यदि इनकी सरकार बनी तो किसानों को दो लाख तक का कर्ज माफ कर देंगे , लेकिन सरकार बनते ही अपने वादे से मुकर गए। कहा, पचास हजार तक ही माफ किया जाएगा , पर आज तक किसानों का 50,000 तक का कर्ज माफ नहीं हुआ। आज भी किसान बैंको एवं प्रज्ञा केंद्र का चक्कर लगा रहे हैं । सरकार ने दूसरा वादा धान अधिप्राप्ति को लेकर किया। धान का न्यूनतम समर्थन मूल्य 2500 रु0 प्रति क्विंटल खरीदने का वादा किया था, लेकिन सरकार बनते ही इस वादे को भी भूल गए। 2050 के दर से कुछ किसानों से खरीदारी की गई पर सही समय पर भुगतान नहीं होने से किसानों को काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। भुगतान के लिए किसानों को कई महीनों तक लैंप्स का चक्कर लगाना पड़ा। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना, जो किसानों को बहुत बड़ी राहत देने वाली योजना थी उनको सरकार ने बंद करा दिया। इसके जगह पर मुख्यमंत्री फसल राहत योजना लागू किया गया, लेकिन वर्ष 2021 में खरीफ में गुलाब चक्रवाती तूफान से हजारों किसानों के धान की फसल का नुकसान हुआ। परंतु किसी किसान को अभी तक बीमा का लाभ नहीं मिल सका। इस वर्ष सुखाड़ पड़ जाने से किसानों को भारी नुकसान हुआ है। हेमंत सरकार ने सुखाड़ से प्रभावित किसानों को राहत देने के लिए शुरुआती दौर में बड़े-बड़े वादे किए। किसानों को भी भरोसा हुआ कि सरकार द्वारा फसल नुकसान का समुचित लाभ मिलेगा। किन्तु यह किसान विरोधी सरकार ने राहत के नाम पर किसानों को झुनझुना थमा दिया। किसानों की स्थिति को देखते हुए 3500 रु0 प्रति किसान राहत देना, ऊंट के मुंह में जीरा का फ़ौरन देने जैसा है। इससे स्पष्ट होता है कि यह सरकार किसानों के प्रति संवेदनशील नहीं है ।
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