प्रफुल्ल चंद्र राय की पुण्यतिथि : पी.सी. राय भारत में रसायन विज्ञान के जनक माने जाते हैं : डॉ. प्रदीप सिंह देव

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देवघर। आज वैज्ञानिक प्रफुल्ल चन्द्र राय की पुण्यतिथि है। आज ही के दिन 16 जून, 1944 में उनकी मृत्यु हुई थी। मौके पर स्थानीय साइंस एंड मैथेमेटिक्स डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन के राष्ट्रीय सचिव डॉ. प्रदीप कुमार सिंह देव ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा- प्रफुल्ल चंद्र राय भारत में रसायन विज्ञान के जनक माने जाते हैं। कलकता विश्वविद्यालय से डिप्लोमा लेने के बाद वे पढ़ने के लिए विदेश चले गए। भारत लौटकर 1889 में प्रेसिडेंसी कॉलेज में रसायन विज्ञान के प्रोफेसर बने। 1901 में बंगाल केमिकल्स एंड फार्मास्युटिकल्स लिमिटेड की नीव रखी। रासायनिक योगिक मर्क्यरियस नाइट्रेट की खोज की। रसायन विज्ञान से जुड़े 100 से अधिक उनके पेपर प्रकाशित हुए। उन्होंने कई मौकों पर राहत कार्यों का भी आयोजन किया। उनका जन्म 2 अगस्त 1861 ई. में जैसोर ज़िले के ररौली गांव में हुआ था। उन्हे जुलाई 1889 में प्रेसिडेंसी कॉलेज में 250 रुपये मासिक वेतन पर रसायनविज्ञान के सहायक प्रोफेसर के पद पर नियुक्त किया गया। यहीं से उनके जीवन का एक नया अध्याय शुरू हुआ। 1911 में वे प्रोफेसर बने। उसी वर्ष ब्रिटिश सरकार ने उन्हें ‘नाइट’ की उपाधि से सम्मानित किया। 1916 में वे प्रेसिडेंसी कॉलेज से रसायन विज्ञान के विभागाध्यक्ष के पद से सेवानिवृत्त हुए। फिर 1916 से 1936 तक उसी जगह एमेरिटस प्रोफेसर के तौर पर कार्यरत रहे। एक दिन वे अपनी प्रयोगशाला में पारे और तेजाब से प्रयोग कर रहे थे। इससे मर्क्यूरस नाइट्रेट नामक पदार्थ बनता है। इस प्रयोग के समय उन्हें कुछ पीले-पीले क्रिस्टल दिखाई दिए। वह पदार्थ लवण भी था तथा नाइट्रेट भी। यह खोज बड़े महत्त्व की थी। वैज्ञानिकों को तब इस पदार्थ तथा उसके गुणधर्मों के बारे में पता नहीं था। उनकी खोज प्रकाशित हुई तो दुनिया भर में डा. राय को ख्याति मिली। उन्होंने एक और महत्वपूर्ण कार्य किया था। वह था अमोनियम नाइट्राइट का उसके विशुद्ध रूप में संश्लेषण। इसके पहले माना जाता था कि अमोनियम नाइट्राइट का तेजी से तापीय विघटन होता है तथा यह अस्थायी होता है। राय ने अपने इन निष्कर्षों को फिर से लंदन की केमिकल सोसायटी की बैठक में प्रस्तुत किया। उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में भी सक्रिय भागीदारी निभाई। वे एक सच्चे देशभक्त थे उनका कहना था;- “विज्ञान प्रतीक्षा कर सकता है, पर स्वराज नहीं”। वह स्वतंत्रता आन्दोलन में एक सक्रिय भागीदार थे। उन्होंने असहयोग आन्दोलन के दौरान भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस के रचनात्मक कार्यों में मुक्तहस्त आर्थिक सहायता दी। उन्होंने अपने एक भाषण में कहा था- “मैं रसायनशाला का प्राणी हूँ। मगर ऐसे भी मौके आते हैं जब वक्त का तकाज़ा होता है कि टेस्ट-ट्यूब छोड़कर देश की पुकार सुनी जाए”।

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