यदि शक्ति एक ही है, तो फिर इतने भिन्न-भिन्न रूपों, कथाओं और परंपराओं की आवश्यकता क्यों पड़ी?

यदि आप देवी के सच्चे भक्त हैं तो यह प्रश्न आपके मन में कभी न कभी अवश्य उठा होगा कि क्या माता पार्वती ही माता दुर्गा हैं, या फिर काली, तारा, छिन्नमस्ता, भुवनेश्वरी, त्रिपुरभैरवी, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी और कमला सभी अलग-अलग देवियां हैं या एक ही शक्ति के विविध रूप हैं।ज्योतिषाचार्य पंडित कृष्ण मेहता ने बताया कि

 हिन्दू धर्म में सैकड़ों देवियों का वर्णन मिलता है—कुछ प्रजापतियों की पुत्रियां, कुछ देवताओं की पत्नियां और कुछ स्वयंभू शक्तियां हैं। यही कारण है कि साधक के मन में यह जिज्ञासा उत्पन्न होती है कि आखिर वह किस देवी की उपासना कर रहा है और इन सभी का आपस में क्या संबंध है। इस गूढ़ रहस्य को समझने के लिए हमें शास्त्रों, विशेष रूप से शिव पुराण में वर्णित ‘आदि शक्ति’ के सिद्धांत को जानना आवश्यक है। शिवपुराण के अनुसार सृष्टि के प्रारंभ में केवल निराकार परम ब्रह्म थे, जिन्हें सदाशिव कहा गया। उस परम तत्व में जब ‘एक से अनेक होने’ की इच्छा उत्पन्न हुई, तब उन्होंने अपनी लीला शक्ति से एक दिव्य शक्ति को प्रकट किया। यह शक्ति ही पराशक्ति, आदिशक्ति, अम्बिका या जगदम्बा कहलाती है। यह शक्ति न तो सती है और न ही पार्वती, बल्कि इन सभी का मूल कारण है। इसे प्रकृति, सर्वेश्वरी, त्रिदेव जननी—अर्थात ब्रह्मा, विष्णु और महेश की माता भी कहा गया है। यह शक्ति अजर-अमर, अविनाशी और सर्वव्यापी है, जो सृष्टि की उत्पत्ति, पालन और संहार तीनों का संचालन करती है। एकांकी होते हुए भी यह शक्ति अपनी माया के कारण अनेक रूपों में प्रकट होती है, इसलिए इसे अम्बे, जगदम्बे, शेरावाली, पहाड़ावाली, चामुंडा, तुलजा आदि अनेक नामों से जाना जाता है और इसे महिषासुर, शुम्भ-निशुम्भ, चंड-मुंड और रक्तबीज जैसे दैत्यों का संहार करने वाली भी कहा गया है। ज्योतिषाचार्य पंडित कृष्ण मेहता ने बताया कि प्रश्न उठता है कि पार्वती का इस शक्ति से क्या संबंध है। शास्त्रों के अनुसार सती, जो प्रजापति दक्ष की पुत्री थीं, उन्होंने अपने पिता के यज्ञ में अपमानित होकर अग्नि में प्रवेश कर शरीर त्याग दिया। वही सती पुनः हिमालय के घर जन्म लेकर पार्वती बनीं और भगवान शिव की पत्नी बनीं। कठोर तपस्या के कारण उनका शरीर काला पड़ गया, लेकिन बाद में शिव ने उन्हें गंगाजल से स्नान कराकर गौर वर्ण प्रदान किया, जिससे वे महागौरी कहलायीं। इस प्रकार पार्वती के जीवन में ही कई रूप देखने को मिलते हैं—शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, महागौरी और स्कंदमाता आदि। नवरात्रि में पूजी जाने वाली नौ देवियां—शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री—एक ही शक्ति के नौ स्वरूप हैं। इनमें से कुछ रूप पार्वती के जीवन से जुड़े हैं, जबकि अन्य रूप आदि शक्ति के व्यापक कार्यों को दर्शाते हैं। कात्यायनी का जन्म महर्षि कात्यायन की तपस्या के फलस्वरूप हुआ और उन्होंने रावण के राज्य की रक्षा भी की। इसी प्रकार दस महाविद्याएं—काली, तारा, त्रिपुरसुंदरी, भुवनेश्वरी, छिन्नमस्ता, त्रिपुरभैरवी, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी और कमला—शक्ति के अत्यंत रहस्यमयी और तांत्रिक स्वरूप हैं। इनमें काली को भगवान शिव की पत्नी माना गया है और उन्होंने रक्तबीज का वध किया। तारा को दक्ष की पुत्री और सती की बहन कहा गया है, जिनकी पूजा हिन्दू, बौद्ध और जैन तीनों धर्मों में होती है। त्रिपुरसुंदरी को त्रिदेवों की जननी माना गया है और भुवनेश्वरी सम्पूर्ण जगत का पालन करने वाली शक्ति हैं। छिन्नमस्ता और धूमावती को पार्वती के रूप माना गया है, जबकि बगलामुखी विनाशकारी शक्तियों को नियंत्रित करने वाली देवी हैं।ज्योतिषाचार्य पंडित कृष्ण मेहता ने बताया कि मातंगी का संबंध प्रकृति और जनजातीय संस्कृति से है और कमला को तांत्रिक लक्ष्मी कहा जाता है, जो समुद्र मंथन से उत्पन्न हुई थीं और भगवान विष्णु की पत्नी बनीं। देवी दुर्गा के स्वरूप की बात करें तो वे विशेष रूप से तब प्रकट होती हैं जब संसार में अधर्म और अत्याचार बढ़ जाता है। महिषासुर, जो अत्यंत शक्तिशाली दैत्य था, उसके अत्याचारों से परेशान होकर देवताओं ने देवी की आराधना की और सभी देवताओं के तेज से एक दिव्य शक्ति उत्पन्न हुई, जिसने महिषासुर का वध किया और महिषासुर मर्दिनी कहलायी। इसी प्रकार शुम्भ-निशुम्भ, चंड-मुंड और रक्तबीज जैसे दैत्यों का वध करने के लिए देवी ने काली, चामुंडा और अन्य उग्र रूप धारण किए। रक्तबीज के वध के समय काली ने उसका रक्त भूमि पर गिरने नहीं दिया, जिससे उसके पुनर्जन्म का अंत हुआ। महाकाली की उत्पत्ति देवी के ललाट से मानी जाती है, जो अत्यंत उग्र और संहारक शक्ति का प्रतीक है। मधु और कैटभ नामक दैत्यों के वध में भी देवी की महत्वपूर्ण भूमिका रही, जहां भगवान विष्णु ने देवी योगनिद्रा की सहायता से उन्हें परास्त किया। इस प्रकार स्पष्ट होता है कि देवी के सभी रूप—चाहे वे सौम्य हों या उग्र—एक ही आदिशक्ति के विभिन्न आयाम हैं। कभी वे सृजन करती हैं, जैसे सरस्वती; कभी पालन करती हैं, जैसे लक्ष्मी; और कभी संहार करती हैं, जैसे दुर्गा और काली। निष्कर्ष रूप में यही कहा जा सकता है कि पार्वती और दुर्गा में कोई मूलभूत अंतर नहीं है, बल्कि वे एक ही शक्ति के अलग-अलग कार्यात्मक रूप हैं। सम्पूर्ण ब्रह्मांड में जो भी शक्ति कार्य कर रही है, वह एक ही आदिशक्ति है, जो विभिन्न नामों और रूपों में प्रकट होती है। इसलिए भक्त जिस भी रूप में देवी की आराधना करता है, वह उसी आदिशक्ति की उपासना करता है। 

पार्वती ही दुर्गा या कुछ और?  गूढ़ रहस्य, तांत्रिक सत्य और देवी स्वरूपों का अंतिम निष्कर्ष?

ज्योतिषाचार्य पंडित कृष्ण मेहता ने बताया कि प्रश्न यह उठता है कि यदि शक्ति एक ही है, तो फिर इतने भिन्न-भिन्न रूपों, कथाओं और परंपराओं की आवश्यकता क्यों पड़ी? यही वह गूढ़ रहस्य है जिसे जानना अत्यंत आवश्यक है।

दरअसल, शास्त्रों में शक्ति को तीन स्तरों पर समझाया गया है—साधारण (भक्ति रूप), दार्शनिक (तत्व रूप) और तांत्रिक (गूढ़ रूप)। सामान्य भक्त के लिए देवी एक मातृरूप हैं, जो रक्षा करती हैं, वरदान देती हैं और संकटों से बचाती हैं। लेकिन जब हम गहराई में जाते हैं, तो यह स्पष्ट होता है कि यह शक्ति केवल बाहरी नहीं, बल्कि हमारे भीतर भी विद्यमान है।

दुर्गा सप्तशती और मार्कण्डेय पुराण में वर्णित कथाएं केवल ऐतिहासिक घटनाएं नहीं हैं, बल्कि वे मानव चेतना के प्रतीकात्मक युद्ध को दर्शाती हैं। उदाहरण के लिए महिषासुर, शुम्भ-निशुम्भ, चंड-मुंड और रक्तबीज—ये सभी बाहरी राक्षस नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर मौजूद अहंकार, क्रोध, वासना, मोह और लोभ के प्रतीक हैं। जब ये दोष बढ़ जाते हैं, तब भीतर की दिव्य शक्ति—अर्थात देवी—जागृत होती है और इनका नाश करती है।ज्योतिषाचार्य पंडित कृष्ण मेहता ने बताया कि

यही कारण है कि माता काली को अत्यंत उग्र रूप में दिखाया जाता है। काली का अर्थ है ‘काल’—समय, जो सबका अंत करता है। यह रूप हमें बताता है कि समय और सत्य के सामने कोई भी अहंकार टिक नहीं सकता। इसी प्रकार माता दुर्गा का सिंह पर सवार होना यह दर्शाता है कि जिसने अपने भीतर के पशु स्वभाव (सिंह) को नियंत्रित कर लिया, वही सच्चा साधक है।

अब बात करते हैं दस महाविद्या के गूढ़ रहस्य की। ये केवल देवियां नहीं, बल्कि चेतना के दस उच्चतम स्तर हैं। काली समय और मृत्यु का सत्य हैं, तारा ज्ञान और मुक्ति की शक्ति हैं, त्रिपुरसुंदरी सौंदर्य और ब्रह्मानंद की प्रतीक हैं, भुवनेश्वरी सम्पूर्ण ब्रह्मांड की धारिणी हैं, छिन्नमस्ता अहंकार के वध का प्रतीक हैं, त्रिपुरभैरवी तप और शक्ति का रूप हैं, धूमावती शून्यता और वैराग्य का प्रतिनिधित्व करती हैं, बगलामुखी शत्रु-विनाश और नियंत्रण की शक्ति हैं, मातंगी ज्ञान और कला की देवी हैं और कमला समृद्धि की तांत्रिक शक्ति हैं। इन सभी को समझे बिना शक्ति साधना अधूरी मानी जाती है।

ज्योतिषाचार्य पंडित कृष्ण मेहता ने बताया कि

एक और अत्यंत गूढ़ तथ्य यह है कि शिव और शक्ति अलग नहीं हैं। शिव बिना शक्ति के ‘शव’ के समान हैं, अर्थात निष्क्रिय। और शक्ति बिना शिव के दिशाहीन ऊर्जा है। यही कारण है कि पार्वती को शिव की अर्धांगिनी कहा गया है—यह केवल दांपत्य संबंध नहीं, बल्कि सृष्टि के संतुलन का प्रतीक है।

ज्योतिषाचार्य पंडित कृष्ण मेहता ने बताया कि तांत्रिक परंपरा में यह भी माना जाता है कि देवी के सभी रूप साधक की आंतरिक यात्रा के चरण हैं। जब साधक भय से मुक्त होता है, तब वह काली को समझता है। जब वह ज्ञान प्राप्त करता है, तब तारा और सरस्वती के स्वरूप को जानता है। जब वह भौतिक और आध्यात्मिक संतुलन प्राप्त करता है, तब लक्ष्मी और कमला का अनुभव करता है। और जब वह पूर्ण समर्पण में पहुंचता है, तब दुर्गा और आदिशक्ति के साथ एकात्म हो जाता है।

इस पूरे रहस्य का अंतिम निष्कर्ष यही है कि देवी कोई बाहरी सत्ता मात्र नहीं हैं, बल्कि वह ऊर्जा हैं जो सृष्टि, प्रकृति और हमारे भीतर समान रूप से प्रवाहित हो रही है। पार्वती, दुर्गा, काली, लक्ष्मी, सरस्वती—ये सभी उसी एक शक्ति के विभिन्न आयाम हैं, जो समय, परिस्थिति और साधक की अवस्था के अनुसार प्रकट होते हैं।

इसलिए जब आप किसी भी देवी की पूजा करते हैं, तो वास्तव में आप उसी एक आदिशक्ति की आराधना कर रहे होते हैं। फर्क केवल नाम, रूप और दृष्टिकोण का है।

साधना, चेतना और ब्रह्मज्ञान का परम निष्कर्ष?

ज्योतिषाचार्य पंडित कृष्ण मेहता ने बताया कि सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न का उत्तर समझना आवश्यक है—इस ज्ञान का साधना और जीवन में क्या महत्व है? और यही वह गूढ़तम रहस्य है, जो केवल शास्त्र पढ़ने से नहीं, बल्कि अनुभव से समझ में आता है।

सनातन दर्शन के अनुसार सम्पूर्ण ब्रह्मांड एक ही ऊर्जा से संचालित है। वही ऊर्जा जब सृष्टि करती है तो उसे सरस्वती कहा जाता है, जब पालन करती है तो लक्ष्मी और जब संतुलन बिगड़ने पर संहार करती है तो दुर्गा या काली कहलाती है। यह केवल देवी की कथा नहीं, बल्कि ब्रह्मांड का नियम है। इसी को समझने के लिए ऋषियों ने विभिन्न देवी स्वरूपों का वर्णन किया, ताकि साधक अपनी क्षमता और श्रद्धा के अनुसार उस शक्ति तक पहुंच सके।

ज्योतिषाचार्य पंडित कृष्ण मेहता ने बताया कि शिव और शक्ति का संबंध इस रहस्य का सबसे महत्वपूर्ण आधार है। शिव चेतना हैं और शक्ति ऊर्जा। जब चेतना और ऊर्जा एक होते हैं, तभी सृष्टि चलती है। यदि शक्ति न हो तो शिव निष्क्रिय हैं और यदि शिव न हों तो शक्ति अनियंत्रित। इसलिए अर्धनारीश्वर का स्वरूप हमें यह सिखाता है कि पुरुष और प्रकृति, चेतना और ऊर्जा, दोनों का संतुलन ही पूर्णता है।

अब साधना के स्तर पर देखें तो देवी के सभी रूप साधक के भीतर ही स्थित हैं। जब मनुष्य अज्ञान में होता है, तो वह बाहरी रूपों में देवी को खोजता है—मंदिरों, मूर्तियों और कथाओं में। लेकिन जैसे-जैसे साधना गहरी होती है, वह समझने लगता है कि देवी बाहर नहीं, उसके भीतर ही विद्यमान है। यही कारण है कि देवी भागवत पुराण और दुर्गा सप्तशती में बार-बार कहा गया है कि देवी ही जीव, जगत और ब्रह्म का मूल है।

ज्योतिषाचार्य पंडित कृष्ण मेहता ने बताया कि गूढ़ तांत्रिक दृष्टिकोण से देखें तो मानव शरीर ही एक ‘शक्ति पीठ’ है। हमारे शरीर में स्थित चक्र—मूलाधार से लेकर सहस्रार तक—देवी के विभिन्न स्वरूपों के केंद्र माने जाते हैं। जब साधक ध्यान और साधना के माध्यम से इन चक्रों को जागृत करता है, तब वह क्रमशः शक्ति के विभिन्न आयामों का अनुभव करता है। यही कुंडलिनी शक्ति है, जिसे आदिशक्ति का सूक्ष्म रूप कहा गया है।

जब यह शक्ति मूलाधार में सुप्त होती है, तब मनुष्य सामान्य जीवन जीता है। लेकिन जैसे ही यह जागृत होकर ऊपर उठती है, साधक के भीतर परिवर्तन शुरू हो जाता है। वह भय, क्रोध, मोह और अहंकार जैसे ‘असुरों’ पर विजय पाने लगता है। यही वास्तविक महिषासुर, शुम्भ-निशुम्भ और रक्तबीज का वध है—जो बाहर नहीं, भीतर होते हैं।

इस अवस्था में माता काली का अनुभव होता है, जो अज्ञान और भय को समाप्त करती हैं। आगे बढ़ने पर माता तारा ज्ञान का मार्ग दिखाती हैं, और अंततः माता त्रिपुरसुंदरी के स्तर पर साधक ब्रह्मानंद का अनुभव करता है। यह वह अवस्था है जहां साधक और साध्य में कोई भेद नहीं रहता।

ज्योतिषाचार्य पंडित कृष्ण मेहता ने बताया कि अंतिम और सबसे गूढ़ रहस्य यह है कि देवी और साधक अलग नहीं हैं। जिस शक्ति की हम पूजा करते हैं, वही शक्ति हमारे भीतर है। जब तक हम उसे बाहर मानते हैं, तब तक हम केवल भक्त हैं। लेकिन जब हम उसे अपने भीतर अनुभव कर लेते हैं, तब हम ‘ज्ञानी’ बन जाते हैं।

यही कारण है कि महान संतों ने कहा है—

“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता:”

अर्थात जहां शक्ति का सम्मान होता है, वहीं दिव्यता का वास होता है।

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