रोजा के बावजूद अकलियत भाई बजरंगबली को चढ़ाए जाने वाले ध्वजा कर रहें हैं तैयार

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देवघर I चैत मास के पावन महीना के साथ साथ अकलियत भाइयों का पवित्र रमजान का माह भी चल रहा है।30 मार्च को रामनवमी है।रमजान और रामनवमी के अवसर पर कानून-व्यवस्था बनाए रखना प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती होती है।लेकिन देवघर में यह पर्व आपसी भाईचारे और सांप्रदायिक सौहार्द का मिशाल प्रस्तुत करता है।दरअसल रामनवमी के अवसर पर बजरंगवली को चढ़ाया जाने वाला ध्वजा यहां मुस्लिम संप्रदाय के लोगो द्वारा बड़ी श्रद्धा के साथ तैयार किया जाता है और उन्ही के द्वारा इसकी बिक्री भी कि जाती है।एक तरफ रोजा रखे हुए है और दूसरी तरफ बड़ी श्रद्धा से रामनवमी में चढ़ने वाली ध्वजा को इनके द्वारा बनाया भी जाता है और बेचा भी जाता है।देवघर की फिजा ही ऐसी है कि यहाँ आज भी रामनवमी में चढ़ाया जाने वाला ध्वजा यहां के मुस्लिम परिवारो द्वारा तैयार किया जाता है और उन्ही के द्वारा बाजार में बेचा भी जाता है।मोहम्मद फ़िरोज़ खान पिछले 30 वर्षों से जबकि मोहम्मद एजाज़ पिछले 35 वर्षों से इनके अलावा बड़ी संख्या में मुस्लिम समुदाय के लोग है जो ध्वजा बनाने का यह काम पुश्तैनी परंपरा के अनुसार करते आ रहे है।मुस्लिम संप्रदाय के लोगो की माने तो इन्हे इस तरह के काम से एक दूसरे की खुशियों में शामिल होने का मौका तो मिलता ही है आपसी भाईचारगी भी कायम रहती है।इतना ही नही उन्हे काफी सुकून और आनंद भी मिलता है।भले ही दूसरे समुदाय के लोगो द्वारा इसे बनाया जाता है लेकिन जो श्रद्धा और नियम से यह ध्वजा बनाया जाता है उसकी खरीदारी भी लोग आसानी से करते है।स्थानीय रूपा केशरी हो या पंकज भदौरिया या फिर लखन यादव या प्रमोद जायसवाल की माने तो आपसी भाई चारा का इससे बड़ा उदाहरण नही हो सकता।

धर्म और संप्रदाय के नाम पर समाज को बांटने की चाहे जितनी भी कोशिश हो रही हो लेकिन देवघर में इसके विपरीत आपसी भाईचारा का उदाहरण किसी पर्व के अवसर पर इसका मुर्त रुप स्पष्ट रुप से देखा जा सकता है।खासकर चुनाव के एन वक्त पर वोट के लिए समाज को जाति,धर्म और संप्रदाय के नाम पर बांटने की कई तरह से कोशिश की जाती है लेकिन देवघर के भाईचारगी के माहौल पर आजतक इसका कोई असर नही पड़ा।

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