मनोविज्ञान पीएचडी शोधार्थी ने किया सोशल मीडिया पर भावुक पोस्ट

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दुमका। सिदो कान्हु मुर्मू विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर मनोविज्ञान विभाग से पीएचडी कर रहे शोधार्थी ने सोशल मीडिया पर भावुक पोस्ट किया। आप समक्ष है डा राकेश का यह पोस्ट “आज मेरी पीएचडी वाइवा (Viva-voce) आज सफलता पूर्वक मनोविज्ञान विभाग, सिदो कान्हू मुर्मू,विश्वविद्यालय दुमका में संपन्न हुआ और इसी के साथ संस्थानिक पढ़ाई भी। शोध-निर्देशक डॉ.कलानन्द ठाकुर सर के निर्देशन और पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ स्वतंत्र कुमार सिंह सर के सहयोग के बिना यह संभव नहीं होता।वर्तमान विभागाध्यक्ष डॉ. विनोद कुमार शर्मा सर का भी आभार व्यक्त करता हूँ।मनोविज्ञान विभाग समेत सिदो कान्हू मुर्मू विश्वविद्यालय, दुमका के माननीय कुलपति प्रो.(डॉ.) सोनाझरिया मिंज,परीक्षा नियंत्रक डॉ.जय कुमार साह सर,डीन सोशल ऑफ साइंस डॉ. जैनेन्द्र यादव सर, ओएसडी डॉ.राजीव रंजन सिन्हा सर, परीक्षा विभाग व शोध शाखा समेत विश्वविद्यालय के सभी कर्मचारियों समेत सभी शिक्षाविदों और सहयोगियों का धन्यवाद।खासकर आज वाइवा में उपस्थित डॉ अजय सिन्हा..समेत सभी शिक्षाविदों का आभार..आपसबों का मार्गदर्शन ज़िन्दगी भर चाहिये.. व्यक्तिगत परेशानियो और चुनौतियो के बीच मेरे पिता जी श्री गिरिधारी दास ,माता जी श्रीमती सुनीता देवी,ससुर जी श्री दिलीप कुमार मेहरा, सासु मां नीतू देवी का आशिर्वाद और परिवार के अन्य सदस्य बहन बिनीता,जीजाजी संजीव जी , बहन प्रीति, भाई राज शेखर, साले साहब रवि,राजीव, साली साहिबा मिन्की रानी समेत सभी परछाई की तरह साथ रहे। पत्नी प्रिया भारती का आजीवन ऋणी रहूँगा।इसी दौरान जन्में मेरे नन्हें बेटे श्रेयांश नील के निश्छल मुस्कान ने थकान महसूस होने नहीं दिया।आप सभी चट्टान की तरह मेरा साथ दिया सभी सफलताओं और विफलताओं के बीच मित्र व बड़े भाई डॉ. नसीम अहमद व मित्र घनश्याम और डॉ आभा एक्का दीदी (मनोविज्ञान विभाग, राँची यूनिवर्सिटी) का साथ बहुत भावुकता भरा रहा। उनका भी अमूल्य योगदान रहा। इस शोध यात्रा के दौरान आंदोलन के साथी बड़े भाई श्यामदेव हेम्ब्रम व मित्र सत्यम कुमार,हुडिंग मरांडी,नवीन कुमार, जुली,कादम्बिनी, छोटे भाई दशरथ का भी अमूल्य योगदान रहा।विशेष रूप से बड़े भाई एयर साथी स्कॉलर हुडिंग दा का साथ बहुत भावुकरहा..कई कठिनाइयों भरा रहा..सोच कर अभी भी आंखे भीग जाती है..साथ ही अनुसूचित जाति छात्रावास संख्या 1,2 और 3 के सभी सीनियर और जूनियर छात्रों का साथ भी अमूल्य रहा।आप सभी मुझे प्रेरित करते रहे। सभी बचपन के मित्रों आलोक,अविनाश, महफुज,रवि फ़जल और सुभाष का साथ भी अमूल्य रहा,आपसबों ने कभी हिम्मत हारने नहीं दिया। जो मुझे निजी तौर से जानते हैं वो मुझे समझतें हैं लेकिन जो मुझे नहीं जानते हैं वे अंदाजा नहीं लगा सकते कि मैं कितने संघर्षों के बाद पीएचडी तक पहुंचा हूँ। मैं उसे याद नहीं करना चाहता। मैं मानता हूँ कि हर किसी का अपना संघर्ष होता है, लेकिन मेरे जैसा संघर्षी विरला होगा। पीछे मुड़कर देखने की उम्मीद मैंने ऐसे ही नहीं छोड़ी है। मैं कुछ याद नहीं करना चाहता। सिर्फ आगे बढ़ना चाहता हूँ। आशा यही है कि जिस तरह से मैं निश्छल और निष्कपट हूँ, ईश्वर मुझे ऐसे ही लोगों की संगति दें। जीवन में मैंने कभी किसी का बुरा नहीं चाहा, किसी को इंतजार नहीं कराया। जो वश में था वक्त से पहले किया। किसी को वचन दिया तो उसे हर हाल में समय से पहले पूरा किया। ईश्वर ने उसका सुफल मुझे दिया है। शिकायत नहीं है उनसे. पता नहीं अगला पड़ाव कौन-सा होगा।पिताजी की बीमारी और आर्थिक कमी के बाद थोड़ा स्थिर-सा हो गया हूँ वरना परिंदों में और मुझमें कोई फर्क नहीं होता। किसी विचारक व्यक्ति के विचार मुझे उसके पक्ष-विपक्ष पर सोचने को मजबूर करते हैं। अपने निराधार विचारों से उलझती हुई मैं जब अपने द्वंद और आपके विचारों को साथ लेकर बैठता था , तब मुझे हमेशा तर्कसिद्ध और सही रास्ता दिखाते रहें। कितना सरल होता है आपका कहना – सत्य के लिए तब तक संघर्ष करो, जब तक संघर्ष की अंतिम सीमा तक न पहुँच जाओ।  पीएचडी करने के लिए निर्देशक और गुरु की आवश्यकता क्यों होती है,ये मुझे मेरे पूजनीय गुरुदेव डॉ. कलानन्द ठाकुर और डॉ. स्वतंत्र कुमार सिंह के सानिध्य में मुझे बखूबी समझ आया।जब भी आपदोनों का नाम मेरे जुबान पर आता है श्रद्धा से आँखे नम हो जाती है।एक शब्द में मेरे लिए भगवान साबित हुए सर आपदोनों…सभी विद्वान गुरुजनों को बारम्बार चरणस्पर्श।”

यह पोस्ट काफी वायरल हो रहा है….

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