राजनीतिक आयोजनों में प्रेस दीर्घा का घटता चलन

पत्रकारों के साथ दिक्कत ये है कि वे समझ नहीं पाते कि पॉलिटिक्स--- पत्रकारिता और पत्रकारों को इस्तेमाल करती है

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गिरिडीह। गिरिडीह जिले में गुरुवार को जब राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री सह बीजेपी की राष्ट्रीय उपाध्यक्षा वसुंधरा राजे सिंधिया का आगमन हुआ,तो कई स्थानों पर हुए आयोजनों में एक बात खल कर गई।वह थी पत्रकार दीर्घा अथवा प्रेस संवाददाताओं,छायाकारों आदि के लिए बैठने हेतु नियत स्थान की अनुपलब्धता।बीजेपी के किसी आयोजक ने कार्यक्रमों के दौरान पत्रकारों के लिए ऐसी ना तो कोई व्यवस्था किया था और ना ही इस चिलचिलाती तपती धूप में उनके लिए पेय जल ही उपलब्ध कराया था।इसे इन दिनों ई मीडिया के बढ़ते प्रभाव की वजह समझा जाए अथवा कुछ और यह समझ से परे है।  बताते हैं कि सत्तारूढ़ दल लंबे समय से मीडिया से बचने या उनको तरजीह नहीं देने की कायल समझी जाती रही है।हालांकि यह भी सत्य है कि हरेक पॉलिटीशियन में सदा मीडिया में बने रहने की उत्कंठा कूट कूट कर भरी होती है। एक समय था,जब पत्रकार दीर्घा हुआ करते थे,आज भी बड़े बड़े आयोजनों में इसका चलन है।लेकिन सत्तारूढ़ दल की बात ही निराली है।पत्रकार जो अपने प्रभावशाली शब्दों को पिरोकर जनमानस में नेता की तश्वीर प्रस्तुत करते हैं,उनकी ही पूछ अब घटती जा रही है।  यह भी सही है कि सौभाग्य या दुर्भाग्य से जितने भी मीडिया हाउस हैं,उनका किसी न किसी राजनीतिक दल से जुड़ाव है। हम सभी जानते हैं कि किस तरह का दबाव होता है, लेकिन हम यह भूल जाते हैं कि जब दूसरों के समय हम कुछ नहीं बोल रहे हैं तो जब हमारे साथ होगा, तो कौन बोलेगा? क्या इसकी कोई गारंटी है कि हमारे साथ ऐसा कुछ नहीं होगा। पत्रकारों के साथ दिक्कत ये है कि वह समझ नहीं पाते कि पॉलिटिक्स पत्रकारिता और पत्रकारों को इस्तेमाल करती है। हम उनके साथ रहते-रहते खुद को ही पत्रकार समझने लगते हैं। हम भूल जाते हैं कि जैसे ही हमारा काम खत्म होगा, हमें पॉलिटिक्स बाहर फेंक देगा। पॉलिटिशियन तो आपसे काम खत्म हो जाने के बाद आपका फोन भी नहीं उठाएगा और ये सबके साथ होगा,चाहे आप बिल्कुल टॉप पर हों या बॉटम में। अभी सबसे बड़ी जरूरत है कि पत्रकार एक-दूजे को सपोर्ट करें।पत्रकार अपना कानूनी हक जानें, क्योंकि औसतन पत्रकार को पता ही नहीं है कि उसके हक क्या हैं, कानून क्या है. जैसे, उसको डिफेमेशन यानी मानहानि का कानून नहीं पता है, पत्रकार को सपोर्ट करनेवाले कानून कौन हैं, अधिकार कौन सा है, ये कुछ नहीं पता है। तो, ये दोनों काम पत्रकारों को जल्द से जल्द करना होगा। इस संबंध में लेखाकार एबीपीएसएस के प्रदेश अध्यक्ष सर्वेश तिवारी ने पत्रकारों से समय को पहचानने की अपील की है।

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