गिरिडीह। डुमरी विधान सभा सीट के प्रबल दावेदार झामुमो को अब अपने इस हॉट सीट पर जीत हासिल कर कब्जा जमाने से रोकना अब किसी भी उम्मीदवार के लिए इतना आसान नहीं होगा,जितनी कि यह लोग पूर्व में आकलन कर अपनी मूंछों पर ताव दे रहे थे।
स्थिति स्पष्ट है कि झामुमो के आलाकमान इस डुमरी विधान सभा सीट पर 1985 से जमाते आ रहे
कब्जा को किसी भी हालत में खोना नहीं चाहती।जिसका संकेत मुख्य मंत्री हेमंत सोरेन ने तीन जुलाई को दिवंगत शिक्षा मंत्री जगरनाथ महतो की पत्नी बेबी देवी को मंत्री मंडल में शामिल कर दे दिया है।बता दें कि जगरनाथ महतो की डुमरी विधान सभा क्षेत्र के मतदाताओं में धाकड़ पकड़ रही है। जिसमें सेंधमारी करना किसी दल के फक्कड़ कार्यकर्ता के बूते की बात नहीं मानी जा सकती है।राजनीतिक दलों के वैसे बडबोले प्रतिनिधि या स्वयंभू नेता जिसने झारखंडी वसुंधरा के मिट्टी की सोंधी महक को अपने खून पसीने से कभी सींचा ही नहीं हो,भोले भाले ग्रामीणों की कचोटती जिंदगी को करीब से देखा और समझा ना हो,भला वे क्या समझेंगे,उनके दुख सुख।
6 अप्रैल को शिक्षा मंत्री जगरनाथ महतो की मृत्यु के बाद से डुमरी विधानसभा की सीट खाली है। संविधान के मुताबिक कोई भी विधानसभा सीट छह महीनों से अधिक समय तक खाली नहीं रखा जा सकता है।जुलाई महीने में उपचुनाव की घोषणा किए जाने के आसार हैं।आम तौर पर चुनाव की घोषणा कम से कम मतदान के 45 दिनों पूर्व की जाती है। चुनाव आयोग के द्वारा देश के विभिन्न राज्यों में एक साथ उपचुनाव का कार्यक्रम तय किया जाता है। राज्य के चुनाव पदाधिकारी के द्वारा पहले ही चुनाव की तैयारी पूरी कर ली गई है।अब बस चुनाव आयोग की घोषणा का बस इंतजार है।
लेकिन डुमरी विस में जगरनाथ महतो के तिलस्म को तोड़ना किसी के लिए भी सहज नहीं कहा जा सकता है।डुमरी विधान सभा की धरती को उन्होंने अपने अथक परिश्रम व पसीने से सींचा है।
डुमरी विधानसभा सीट की बात करें तो पिछले चार बार लगातार स्वर्गीय जगरनाथ महतो ने जीत हासिल की थी। वह 2005,2009, 2014 और 2019 में चुनाव जीते थे। ऐसे में यह सीट झामुमो की पारंपरिक सीट की तौर पर माना जा रहा है। वहीं एनडीए की बात करे तो
दरअसल 2019 के चुनाव में बीजेपी और आजसू दोनो ने अलग-अलग चुनाव लड़ा था, जिसमें आजसू दूसरे नंबर पर आई थी। ऐसे में जनाधार के अनुसार आजसू अपनी उम्मीदवार का दावा करने का मन बना सकती है। इसी वर्ष फरवरी में रामगढ़ उपचुनाव में बीजेपी, आजसू को साथ आने का फायदा मिला था। एनडीए को उम्मीद है कि यहां भी सफलता दोहराई जा सकती है।आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि प्रत्याशी के रूप में एनडीए ने अभी तक अपना पत्ता नहीं खोला है।